हिन्दी आलोचना की वैचारिक यात्रा
हिन्दी आलोचना की वैचारिक यात्रा हिन्दी आलोचना के आरम्भिक युग में सामान्यत : यह धारणा प्रचलित थी कि आलोचना का अर्थ कृति विशेष का गुण - दोष विवेचन मात्र है पर अब हिन्दी आलोचना का दायरा बढ़ा है। आलोचना पर विचार करते हुए रमेश दवे लिखते हैं कि ‘‘ आलोचना सृजन में अर्थ का अन्वेषण है। एक सर्जक किसी भी रचना को जो रूप , आकार , विचार और कल्पना देता है , आलोचना उन्हें इनकी कसौटी पर कसती है। फिर इनके बीच प्रयुक्त शब्द , वाक्य - संरचना , शिल्प , प्रतीक , बिम्ब , लय , ध्वनि आदि का विश्लेषण करती है। आलोचना सर्जक और पाठक में ऐसा भेद - अभेद उत्पन्न करती है कि वे रचना की शक्ति और रचना की कमियों को पहचानने लगते हैं। वह भावुकता की भूमि पर खड़ी होकर फैसले नहीं देती , बल्कि रचना की आंतरिक काया में प्रवेश कर एक नयी अर्थ - दृष्टि का आविष्कार करती हैं। ’’ [1] वस्तुत : आलोचना रचना और पाठक के बीच सेतु का काम करती है। आलोचना का अध्ययन करते हुए पाठक को उन सभी परिस्थितियों से गुजरताहै , जिनसे गुजर कर रचनाकार रचना को मूर्त रूप देता है। सामान्य अर्थ में आलोचना रचना का समग्र मूल्यांकन है...